Sumitranandan Pant Archive

रूप-तारा तुम पूर्ण प्रकाम / सुमित्रानंदन पंत

रूप-तारा तुम पूर्ण प्रकाम; मृगेक्षिणि! सार्थक नाम। एक लावण्य-लोक छबिमान, नव्य-नक्षत्र समान, उदित हो दृग-पथ में अम्लान तारिकाओं की तान! प्रणय का रच तुमने परिवेश दीप्त कर दिया मनोनभ-देश; स्निग्ध सौन्दर्य-शिखा अनिमेष! अमन्द, अनिन्द्य, अशेष! उषा सी स्वर्णोदय पर भोर …

मधुवन / सुमित्रानंदन पंत

आज नव-मधु की प्रात झलकती नभ-पलकों में प्राण! मुग्ध-यौवन के स्वप्न समान,– झलकती, मेरी जीवन-स्वप्न! प्रभात तुम्हारी मुख-छबि-सी रुचिमान! आज लोहित मधु-प्रात व्योम-लतिका में छायाकार खिल रही नव-पल्लव-सी लाल, तुम्हारे मधुर-कपोलों पर सुकुमार लाज का ज्यों मृदु किसलय-जाल! आज उन्मद …

आज रहने दो यह गृह-काज / सुमित्रानंदन पंत

आज रहने दो यह गृह-काज, प्राण! रहने दो यह गृह-काज! आज जाने कैसी वातास छोड़ती सौरभ-श्लथ उच्छ्वास, प्रिये लालस-सालस वातास, जगा रोओं में सौ अभिलाष। आज उर के स्तर-स्तर में, प्राण! सजग सौ-सौ स्मृतियाँ सुकुमार, दृगों में मधुर स्वप्न-संसार, मर्म …

नवल मेरे जीवन की डाल / सुमित्रानंदन पंत

नवल मेरे जीवन की डाल बन गई प्रेम-विहग का वास! आज मधुवन की उन्मद वात हिला रे गई पात-सा गात, मन्द्र, द्रुम-मर्मर-सा अज्ञात उमड़ उठता उर में उच्छ्वास! नवल मेरे जीवन की डाल बन गई प्रेम-विहग का वास! मदिर-कोरों-से कोरक …

तुम्हारी आँखों का आकाश / सुमित्रानंदन पंत

तुम्हारी आँखों का आकाश, सरल आँखों का नीलाकाश- खो गया मेरा खग अनजान, मृगेक्षिणि! इनमें खग अज्ञान। देख इनका चिर करुण-प्रकाश, अरुण-कोरों में उषा-विलास, खोजने निकला निभृत निवास, पलक-पल्लव-प्रच्छाय-निवास; न जाने ले क्या क्या अभिलाष खो गया बाल-विहग-नादान! तुम्हारे नयनों …

नील-कमल सी हैं वे आँख / सुमित्रानंदन पंत

नील-कमल-सी हैं वे आँख! डूबे जिनके मधु में पाँख— मधु में मन-मधुकर के पाँख! नील-जलज-सी हैं वे आँख! मुग्ध स्वर्ण-किरणों ने प्रात प्रथम खिलाए वे जलजात; नील व्योम ने ढल अज्ञात उन्हें नीलिमा दी नवजात; जीवन की सरसी उस प्रात …

मुसकुरा दी थी क्या तुम प्राण / सुमित्रानंदन पंत

मुसकुरा दी थी क्या तुम, प्राण! मुसकुरा दी थी आज विहान? आज गृह-वन-उपवन के पास लोटता राशि-राशि हिम-हास, खिल उठी आँगन में अवदात कुन्द-कलियों की कोमल-प्रात। मुसकुरा दी थी, बोलो, प्राण! मुसकुरा दी थी तुम अनजान? आज छाया चहुँदिशि चुपचाप …

कब से विलोकती तुमको / सुमित्रानंदन पंत

कब से विलोकती तुमको ऊषा आ वातायन से? सन्ध्या उदास फिर जाती सूने-गृह के आँगन से! लहरें अधीर सरसी में तुमको तकतीं उठ-उठ कर, सौरभ-समीर रह जाता प्रेयसि! ठण्ढी साँसे भर! हैं मुकुल मुँदे डालों पर, कोकिल नीरव मधुबन में; …

प्रिये, प्राणों की प्राण / सुमित्रानंदन पंत

भावी पत्नी के प्रति प्रिये, प्राणों की प्राण! न जाने किस गृह में अनजान छिपी हो तुम, स्वर्गीय-विधान! नवल-कलिकाओं की-सी वाण, बाल-रति-सी अनुपम, असमान– न जाने, कौन, कहाँ, अनजान, प्रिये, प्राणों की प्राण! जननि-अंचल में झूल सकाल मृदुल उर-कम्पन-सी वपुमान; …

झर गई कली / सुमित्रानंदन पंत

झर गई कली, झर गई कली! चल-सरित-पुलिन पर वह विकसी, उर के सौरभ से सहज-बसी, सरला प्रातः ही तो विहँसी, रे कूद सलिल में गई चली! आई लहरी चुम्बन करने, अधरों पर मधुर अधर धरने, फेनिल मोती से मुँह भरने, …