Shambhu Prasad Srivastava Archive

लाखों में एक / शंभूप्रसाद श्रीवास्तव

आसमान में लाखों तारे लेकिन उनको कौन निहारे, उगकर सारी रात चमकते मगर अँधेरा मिटा न सकते। एक अकेला चंदा आकर अपनी किरणों को फैलाकर, सबकी आँखें शीतल करता सबके मन में अमृत भरता। यह दुनिया भी बहुत बड़ी है …

हीरा-मोती / शंभूप्रसाद श्रीवास्तव

हम गाँवों में खिलने वाले नन्हे-मुन्ने फूल, चंदन बन जाती है जगकर अंग हमारे धूल! सीधा-सादा रहन-सहन मोटा खाना, पहनावा, नहीं जानते ठाट-बाट चतुराई और दिखावा। मिलीं गोद में हमें प्रकृति की दो वस्तुएँ महान, हीरे जैसी हँसी हमारी, मोती-सी …

नाच बँदरिया / शंभूप्रसाद श्रीवास्तव

डमक-डमक-डम, डम-डम-डम नाच बँदरिया छम-छम-छम! तेरा बंदर है शौकीन, पहने है कपड़े रंगीन, नेकटाई चश्मा, पतलून, घर है उसका देहरादून, नहीं किसी साहब से कम, नाच बँदरिया छम-छम-छम! तू पहने कुरती-सलवार, लाल दुपट्टा बूटेदार, कंगन, टीका, झुमका, हार, नकली गहनों …