Sanjay Kumar Kundan Archive

भेड़िए / संजय कुमार कुंदन

आज का दिन अजब-सा गुज़रा है इस तरह जैसे दिन के दाँतों में गोश्त का कोई मुख़्तसर रेशा बेसबब आ के फँस गया-सा हो एक मौजूदगी हो अनचाही एक मेहमान नाख़रूश जिसे चाहकर भी निकाल ना पाएँ और जबरन जो …

मगर क्यूँ नज़्म लिक्खूँ / संजय कुमार कुंदन

अजब सी एक बचकानी-सी ख़्वाहिश है मुहब्बत की कोई इक नज़्म लिक्खूँ किसी माशूक़ की जुल्फों के साए लबों की नर्मियों की थरथराहट लरज़ते काँपते क़दमों की आहट किसी मासूम सीने में छुपी बेबाक धड़कन कोई सहसा-सा कमरा, कोई वीरान …