Om Nishchal Archive

कुछ ना कहो / ओम निश्चल

कुछ ना कहो….. जैसे मैं बह रही हूँ भावों की नाव में वैसे तुम भी बहो….. कुछ ना कहो…………..कुछ ना कहो …..। थोड़ा चुप भी रहो जैसे चुप हैं हवाएँ जैसे गाती दिशाएँ जैसे बारिश की बून्दें सुनें आँख मूँदे …

ये सर्द मौसम ये शोख लम्‍हे / ओम निश्चल

ये सर्द मौसम, ये शोख लम्‍हे फ़िजा में आती हुई सरसता, खनक-भरी ये हँसी कि जैसे क्षितिज में चमके हों मेघ सहसा। हुलस के आते हवा के झोंके धुऍं के फाहे रुई के धोखे कहीं पे सूरज बिलम गया है …

दीवाली पर पिया / ओम निश्चल

दीवाली पर पिया, चौमुख दरवाज़े पर बालूँगी मैं दिया । ओ पिया । उभरेंगे आँखों में सपनों के इंद्रधनुष, होठों पर सोनजुही सुबह मुस्कराएगी, माथे पर खिंच जाएँगी भोली सलवटें अगवारे पिछवारे फ़सल महमहाएगी हेर-हेर फूलों की पाँखुरी जुटाऊँगी, आँगन-चौबारे …

मेरी पगडंडी मत भूलना / ओम निश्चल

बँगले में रहना जी मोटर में घूमना मेरी पगडंडी मत भूलना । भूल गयी होंगी वे नेह छोह की बातें पाती लिख लिख प्रियवर भेज रही सौगातें हँसी-खुशी रहना जी फूलों-सा झूमना पर मेरी याद नहीं भूलना । मेरी पगडंडी …

कह दो तो! / ओम निश्चल

जूड़े मे फूल टाँक दूँ ओ प्रिया कह दो तो हरसिंगार का दूध नहाई जैसी रात हुई साँवरी, रह-रह के भिगो रही पुरवाई बावरी, भीग गया है तन-मन पाँवों में है रुनझुन अंग-अंग में उभार दूँ ओ प्रिया, कह दो …

मेघदूत-सा मन / ओम निश्चल

साँस तुम्हारी योजनगंधा, मेघदूत-सा मन मेरा है । दूध धुले हैं पाँव तुम्हारे अंग-अंग दिखती उबटन है मेरी जन्मकुंडली जिसमें लिखी हुई हर पल भटकन है कैसे चलूँ तुम्हारे द्वारे तुम रतनारी,हम कजरारे, कमलनाल-सी देह तुम्हारी देवदारु-सा तन मेरा है …

मौसम ठहर जाए / ओम निश्चल

मेघ का, मल्हार का मौसम ठहर जाए, कुछ करो- यह प्यार का मौसम ठहर जाए । जल रहा मन आज सुधियों के अंगारों में, दर्द कुछ हल्का हुआ है इन फुहारों में, रुप का, अभिसार का मौसम ठहर जाए । …

फिर घटाएं जामुनी छाने लगी हैं / ओम निश्चल

उठ गए डेरे यहॉं से धूप के डोलियॉं बरसात की आने लगी हैं। चल पड़ी हैं फिर हवाएँ कमल-वन से, घिर गए हैं मेघ नभ पर मनचले, शरबती मौसम नशीला हो रहा तप्त तावे-से तपिश के दिन ढले सुरमई आँचल …

गीतों के गॉंव / ओम निश्चल

फूलों के गाँव फसलों के गाँव आओ चलें गीतों के गाँव। महके कोई रह रह के फूल रेशम हुई राहों की धूल बहती हुई अल्हड़ नदी ढहते हुए यादों के कूल चंदा के गाँव सूरज के गाँव आओ चलें तारों …

तुम्हारे साथ / ओम निश्चल

तुम्हारे साथ प्रकृति की सैर तुम्हारे मन में नेह अछोर तुम्हारे बोल चपल चंचल किए जाते हैं भाव-विभोर तुम्हारी बॉंहों का आकाश खींचता हर पल अपने पास। तुम्हारे साथ बड़ा होना तुम्हारे संग खड़ा होना तुम्हारे होने भर से ही …