Dharmveer Bharti Archive

पंचम अंक /अन्धा युग/ धर्मवीर भारती

कृपाचार्य – यह क्या किया, अश्वत्थामा। यह क्या किया? अश्वत्थामा – पता नहीं मैंने क्या किया, मातुल मैंने क्या किया! क्या मैंने कुछ किया? कृतवर्मा – कृपाचार्य भय लगता है मुझको इस अश्वत्थामा से! (कृपाचार्य अश्वत्थामा को बिठाकर, उसका कमरबन्द …

चतुर्थ अंक /अन्धा युग/ धर्मवीर भारती

अश्वत्थामा – यह मेरा धनुष है धनुष अश्वत्थामा का जिसकी प्रत्यंचा खुद द्रोण ने चढ़ाई थी आज जब मैंने दुर्योधन को देखा नि:शस्त्र, दीन आँखों में आँसू भरे मैंने मरोड़ दिया अपने इस धनुष को। कुचले हुए साँप-सा भयावह किन्तु …

तृतीय अंक /अन्धा युग/ धर्मवीर भारती

कथा-गायन- संजय तटस्थद्रष्टा शब्दों का शिल्पी है पर वह भी भटक गया असंजस के वन में दायित्व गहन, भाषा अपूर्ण, श्रोता अन्धे पर सत्य वही देगा उनको संकट-क्षण में वह संजय भी इस मोह-निशा से घिर कर है भटक रहा …

द्वितीय अंक /अन्धा युग/ धर्मवीर भारती

धृतराष्ट्र- विदुर- कौन संजय? नहीं! विदुर हूँ महाराज। विह्वल है सारा नगर आज बचे-खुचे जो भी दस-बीस लोग कौरव नगरी में हैं अपलक नेत्रों से कर रहे प्रतीक्षा हैं संजय की। (कुछ क्षण महाराज के उत्तर की प्रतीक्षा कर) महाराज …

पहला अंक /अन्धा युग/ धर्मवीर भारती

कौरव नगरी तीन बार तूर्यनाद के उपरान्त कथा-गायन टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा उसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है पाण्डव ने कुछ कम कौरव ने कुछ ज्यादा यह रक्तपात अब कब समाप्त होना है यह अजब युद्ध है नहीं …

स्थापना /अन्धा युग/ धर्मवीर भारती

मंगलाचरण नारायणम् नमस्कृत्य नरम् चैव नरोत्तमम्। देवीम् सरस्वतीम् व्यासम् ततो जयमुदीयरेत्। उद्घोषणा जिस युग का वर्णन इस कृति में है उसके विषय में विष्णु-पुराण में कहा है : ततश्चानुदिनमल्पाल्प ह्रास व्यवच्छेददाद्धर्मार्थयोर्जगतस्संक्षयो भविष्यति।’ उस भविष्य में धर्म-अर्थ ह्रासोन्मुख होंगे क्षय …

आद्यन्त / धर्मवीर भारती

1 जिन्दगी की डाल पर कण्टकों के जाल पर-काश एक फूल-सा मैं भी अगर फूलता ! कोयलों से सीखता जिन्दगी के मधुर गीत बुलबुलों से पालता हिलमिल कर प्रेम प्रीत पत्तियों के संग झूम तितलियों के पंख चूम चाँदी भरी …

रवीन्द्र से / धर्मवीर भारती

नहीं नहीं कभी नहीं थी, कोई नौका सोने की ! सिर्फ दूर तक थी बालू, सिर्फ दूर तक अँधियारा वह थी क्या अपनी ही प्यास, कहा था जिसे जलधारा ? नहीं दिखा कोई भी पाल, नहीं उठी कोई पतवार …

उसी ने रचा है / धर्मवीर भारती

नहीं-वह नहीं जो कुछ मैंने जिया बल्कि वह सब-वह सब जिसके द्वारा मैं जिया गया नहीं, वह नहीं जिसको मैंने ही चाहा, अवगाहा, उगाहा- जो मेरे ही अनवरत प्रयासों से खिला बल्कि वह जो अनजाने ही किसी पगडंडी पर अपने-आप …