Bhagwati Charan Verma Archive

भैंसागाड़ी / भगवतीचरण वर्मा

चरमर- चरमर- चूँ- चरर- मरर जा रही चली भैंसागाड़ी ! गति के पागलपन से प्रेरित चलती रहती संसृति महान; सागर पर चलते हैं जहाज , अंबर पर चलते वायुयान . भूतल के कोने-कोने में रेलों-ट्रामों का जाल बिछा , हैं …

मानव / भगवतीचरण वर्मा

जब किलका को मादकता में हंस देने का वरदान मिला जब सरिता की उन बेसुध सी लहरों को कल कल गान मिला जब भूले से भरमाए से भर्मरों को रस का पान मिला तब हम मस्तों को हृदय मिला मर …

बसन्तोत्सव / भगवतीचरण वर्मा

मस्ती से भरके जबकि हवा सौरभ से बरबस उलझ पड़ी तब उलझ पड़ा मेरा सपना कुछ नये-नये अरमानों से; गेंदा फूला जब बागों में सरसों फूली जब खेतों में तब फूल उठी सहस उमंग मेरे मुरझाये प्राणों में; कलिका के …

अज्ञात देश से आना / भगवतीचरण वर्मा

मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ अपने प्रकाश की रेखा तम के तट पर अंकित है निःसीम नियति का लेखा देने वाले को अब तक मैं देख नहीं पाया हूँ, पर पल भर सुख भी देखा फिर पल भर दुख …

मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम / भगवतीचरण वर्मा

मातृ-भू, शत-शत बार प्रणाम ऐ अमरों की जननी, तुमको शत-शत बार प्रणाम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम। तेरे उर में शायित गांधी, ‘बुद्ध औ’ राम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम। हिमगिरि-सा उन्नत तव मस्तक, तेरे चरण चूमता सागर, श्वासों में हैं वेद-ऋचाएँ …

हम दीवानों की क्या हस्ती / भगवतीचरण वर्मा

हम दीवानों की क्या हस्ती, आज यहाँ कल वहाँ चले मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले आए बनकर उल्लास कभी, आँसू बनकर बह चले अभी सब कहते ही रह गए, अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले …

आज मानव का सुनहला प्रात है / भगवतीचरण वर्मा

आज मानव का सुनहला प्रात है, आज विस्मृत का मृदुल आघात है; आज अलसित और मादकता-भरे, सुखद सपनों से शिथिल यह गात है; मानिनी हँसकर हृदय को खोल दो, आज तो तुम प्यार से कुछ बोल दो । आज सौरभ …

बस इतना–अब चलना होगा / भगवतीचरण वर्मा

बस इतना–अब चलना होगा फिर अपनी-अपनी राह हमें। कल ले आई थी खींच, आज ले चली खींचकर चाह हमें तुम जान न पाईं मुझे, और तुम मेरे लिए पहेली थीं; पर इसका दुख क्या? मिल न सकी प्रिय जब अपनी …

संकोच-भार को सह न सका / भगवतीचरण वर्मा

संकोच-भार को सह न सका पुलकित प्राणों का कोमल स्वर कह गये मौन असफलताओं को प्रिय आज काँपते हुए अधर। छिप सकी हृदय की आग कहीं ? छिप सका प्यार का पागलपन ? तुम व्यर्थ लाज की सीमा में हो …

कल सहसा यह सन्देश मिला / भगवतीचरण वर्मा

कल सहसा यह सन्देश मिला सूने-से युग के बाद मुझे कुछ रोकर, कुछ क्रोधित हो कर तुम कर लेती हो याद मुझे। गिरने की गति में मिलकर गतिमय होकर गतिहीन हुआ एकाकीपन से आया था अब सूनेपन में लीन हुआ। …