Barah Maha Tukhari Raag Guru Nanak Dev Ji / तुखारी बारह माहा गुरू नानक देव जी

तुखारी बारह माहा गुरू नानक देव जी

बारह माहा

तू सुणि किरत करमा पुरबि कमाइआ ॥
सिरि सिरि सुख सहमा देहि सु तू भला ॥
हरि रचना तेरी किआ गति मेरी हरि बिनु घड़ी न जीवा ॥
प्रिअ बाझु दुहेली कोइ न बेली गुरमुखि अम्रितु पीवां ॥
रचना राचि रहे निरंकारी प्रभ मनि करम सुकरमा ॥
नानक पंथु निहाले सा धन तू सुणि आतम रामा ॥१॥

बाबीहा प्रिउ बोले कोकिल बाणीआ ॥
सा धन सभि रस चोलै अंकि समाणीआ ॥
हरि अंकि समाणी जा प्रभ भाणी सा सोहागणि नारे ॥
नव घर थापि महल घरु ऊचउ निज घरि वासु मुरारे ॥
सभ तेरी तू मेरा प्रीतमु निसि बासुर रंगि रावै ॥
नानक प्रिउ प्रिउ चवै बबीहा कोकिल सबदि सुहावै ॥२॥

तू सुणि हरि रस भिंने प्रीतम आपणे ॥
मनि तनि रवत रवंने घड़ी न बीसरै ॥
किउ घड़ी बिसारी हउ बलिहारी हउ जीवा गुण गाए ॥
ना कोई मेरा हउ किसु केरा हरि बिनु रहणु न जाए ॥
ओट गही हरि चरण निवासे भए पवित्र सरीरा ॥
नानक द्रिसटि दीरघ सुखु पावै गुर सबदी मनु धीरा ॥३॥

बरसै अम्रित धार बूंद सुहावणी ॥
साजन मिले सहजि सुभाइ हरि सिउ प्रीति बणी ॥
हरि मंदरि आवै जा प्रभ भावै धन ऊभी गुण सारी ॥
घरि घरि कंतु रवै सोहागणि हउ किउ कंति विसारी ॥
उनवि घन छाए बरसु सुभाए मनि तनि प्रेमु सुखावै ॥
नानक वरसै अम्रित बाणी करि किरपा घरि आवै ॥४॥

चेतु बसंतु भला भवर सुहावड़े ॥
बन फूले मंझ बारि मै पिरु घरि बाहुड़ै ॥
पिरु घरि नही आवै धन किउ सुखु पावै बिरहि बिरोध तनु छीजै ॥
कोकिल अम्बि सुहावी बोलै किउ दुखु अंकि सहीजै ॥
भवरु भवंता फूली डाली किउ जीवा मरु माए ॥
नानक चेति सहजि सुखु पावै जे हरि वरु घरि धन पाए ॥५॥

वैसाखु भला साखा वेस करे ॥
धन देखै हरि दुआरि आवहु दइआ करे ॥
घरि आउ पिआरे दुतर तारे तुधु बिनु अढु न मोलो ॥
कीमति कउण करे तुधु भावां देखि दिखावै ढोलो ॥
दूरि न जाना अंतरि माना हरि का महलु पछाना ॥
नानक वैसाखीं प्रभु पावै सुरति सबदि मनु माना ॥६॥

माहु जेठु भला प्रीतमु किउ बिसरै ॥
थल तापहि सर भार सा धन बिनउ करै ॥
धन बिनउ करेदी गुण सारेदी गुण सारी प्रभ भावा ॥
साचै महलि रहै बैरागी आवण देहि त आवा ॥
निमाणी निताणी हरि बिनु किउ पावै सुख महली ॥
नानक जेठि जाणै तिसु जैसी करमि मिलै गुण गहिली ॥७॥

आसाड़ु भला सूरजु गगनि तपै ॥
धरती दूख सहै सोखै अगनि भखै ॥
अगनि रसु सोखै मरीऐ धोखै भी सो किरतु न हारे ॥
रथु फिरै छाइआ धन ताकै टीडु लवै मंझि बारे ॥
अवगण बाधि चली दुखु आगै सुखु तिसु साचु समाले ॥
नानक जिस नो इहु मनु दीआ मरणु जीवणु प्रभ नाले ॥८॥

सावणि सरस मना घण वरसहि रुति आए ॥
मै मनि तनि सहु भावै पिर परदेसि सिधाए ॥
पिरु घरि नही आवै मरीऐ हावै दामनि चमकि डराए ॥
सेज इकेली खरी दुहेली मरणु भइआ दुखु माए ॥
हरि बिनु नीद भूख कहु कैसी कापड़ु तनि न सुखावए ॥
नानक सा सोहागणि कंती पिर कै अंकि समावए ॥९॥

भादउ भरमि भुली भरि जोबनि पछुताणी ॥
जल थल नीरि भरे बरस रुते रंगु माणी ॥
बरसै निसि काली किउ सुखु बाली दादर मोर लवंते ॥
प्रिउ प्रिउ चवै बबीहा बोले भुइअंगम फिरहि डसंते ॥
मछर डंग साइर भर सुभर बिनु हरि किउ सुखु पाईऐ ॥
नानक पूछि चलउ गुर अपुने जह प्रभु तह ही जाईऐ ॥१०॥

असुनि आउ पिरा सा धन झूरि मुई ॥
ता मिलीऐ प्रभ मेले दूजै भाइ खुई ॥
झूठि विगुती ता पिर मुती कुकह काह सि फुले ॥
आगै घाम पिछै रुति जाडा देखि चलत मनु डोले ॥
दह दिसि साख हरी हरीआवल सहजि पकै सो मीठा ॥
नानक असुनि मिलहु पिआरे सतिगुर भए बसीठा ॥११॥

कतकि किरतु पइआ जो प्रभ भाइआ ॥
दीपकु सहजि बलै तति जलाइआ ॥
दीपक रस तेलो धन पिर मेलो धन ओमाहै सरसी ॥
अवगण मारी मरै न सीझै गुणि मारी ता मरसी ॥
नामु भगति दे निज घरि बैठे अजहु तिनाड़ी आसा ॥
नानक मिलहु कपट दर खोलहु एक घड़ी खटु मासा ॥१२॥

मंघर माहु भला हरि गुण अंकि समावए ॥
गुणवंती गुण रवै मै पिरु निहचलु भावए ॥
निहचलु चतुरु सुजाणु बिधाता चंचलु जगतु सबाइआ ॥
गिआनु धिआनु गुण अंकि समाणे प्रभ भाणे ता भाइआ ॥
गीत नाद कवित कवे सुणि राम नामि दुखु भागै ॥
नानक सा धन नाह पिआरी अभ भगती पिर आगै ॥१३॥

पोखि तुखारु पड़ै वणु त्रिणु रसु सोखै ॥
आवत की नाही मनि तनि वसहि मुखे ॥
मनि तनि रवि रहिआ जगजीवनु गुर सबदी रंगु माणी ॥
अंडज जेरज सेतज उतभुज घटि घटि जोति समाणी ॥
दरसनु देहु दइआपति दाते गति पावउ मति देहो ॥
नानक रंगि रवै रसि रसीआ हरि सिउ प्रीति सनेहो ॥१४॥

माघि पुनीत भई तीरथु अंतरि जानिआ ॥
साजन सहजि मिले गुण गहि अंकि समानिआ ॥
प्रीतम गुण अंके सुणि प्रभ बंके तुधु भावा सरि नावा ॥
गंग जमुन तह बेणी संगम सात समुंद समावा ॥
पुंन दान पूजा परमेसुर जुगि जुगि एको जाता ॥
नानक माघि महा रसु हरि जपि अठसठि तीरथ नाता ॥१५॥

फलगुनि मनि रहसी प्रेमु सुभाइआ ॥
अनदिनु रहसु भइआ आपु गवाइआ ॥
मन मोहु चुकाइआ जा तिसु भाइआ करि किरपा घरि आओ ॥
बहुते वेस करी पिर बाझहु महली लहा न थाओ ॥
हार डोर रस पाट पट्मबर पिरि लोड़ी सीगारी ॥
नानक मेलि लई गुरि अपणै घरि वरु पाइआ नारी ॥१६॥

बे दस माह रुती थिती वार भले ॥
घड़ी मूरत पल साचे आए सहजि मिले ॥
प्रभ मिले पिआरे कारज सारे करता सभ बिधि जाणै ॥
जिनि सीगारी तिसहि पिआरी मेलु भइआ रंगु माणै ॥
घरि सेज सुहावी जा पिरि रावी गुरमुखि मसतकि भागो ॥
नानक अहिनिसि रावै प्रीतमु हरि वरु थिरु सोहागो ॥१७॥१॥੧੧੦੭-੦੯॥

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *