हाथ फैलाने अंदाज़ सिखाता क्यूँ है / ज्ञान प्रकाश विवेक

हाथ फैलाने के अंदाज़ सिखाता क्यूँ है
राहतें दे के मुझे इतना झुकाता क्यूँ है

खिड़कियाँ खोल कि मौसम का तुझे इल्म रहे
बन्द कमरे की तरह ख़ुद को बनाता क्यूँ है

तितलियाँ लगती हैं अच्छी जो उड़ें गुलशन में
तू उन्हें मार के एलबम में सजाता क्यूँ है

तू है तूफ़ान तो फिर राजमहल से टकरा
मेरी बोसीदा-सी दीवार गिराता क्यूँ है

टूट के गिर न पड़ें अश्क मेरी आँखों से
बेवजह दोस्त मुझे इतना हँसाता क्यूँ है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *