हहर हवेली सुनि सटक समरकंदी / गँग

हहर हवेली सुनि सटक समरकंदी,
धीर न धरत धुनि सुनत निसाना की।
मछम को ठाठ ठठ्यो प्रलय सों पटलबौ ‘गंग’,
खुरासान अस्पहान लगे एक आना की।
जीवन उबीठे बीठे मीठे-मीठे महबूबा,
हिए भर न हेरियत अबट बहाना की।
तोसखाने, फीलखाने, खजाने, हुरमखाने,
खाने खाने खबर नवाब ख़ानखाना की।

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