हम लोग सोचते हैं हमें कुछ मिला नहीं / बशीर बद्र

हम लोग सोचते हैं हमें कुछ मिला नहीं
शहरों से वापसी का कोई रास्ता नहीं

इक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं
किस को तलाश करते रहे कुछ पता नहीं

शिद्दत की धूफ, तेज हवाओं के बावज़ूद
मैं शाख़ से गिरा हूँ, नज़र से गिरा नहीं

आख़िर ग़ज़ल का ताजमहल भी है मक़बरा
हम ज़िन्दगी थे, हमको किसी ने जिया नहीं

जिसकी मुख़ालिफ़त हुई, मशहूर हो गया
इन पत्थरों से कोई परिन्दा गिरा नहीं

तारीकियों में और चमकती है दिल की धूप
सूरज तमाम रात यहाँ डूबता नहीं

किसने जलाई बस्तियाँ, बाज़ार क्यों लुटे
मैं चाँद पर गया था, मुझे कुछ पता नहीं

(१९९५)

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