समुद्र-1 / पंकज परिमल

सबसे ज्यादा मुश्किल
समुद्र के सामने थी
उसके पास तो सभी आते थे
पर उसे कहीं जाना नहीं था
उसके पास सबसे ज्यादा रत्न थे
और उसकी छाती पर
सबसे ज्यादा डाकुओं के जहाज
सूरज उसे सोखता था
तो मौज आती थी
पोखरों, तालाबों और नदियों की
नदियां तो उसका हिस्सा
ईमानदारी से ले आती थीं
पर छोटे-छोटे तालाब
पानी मारकर सांस भी नहीं लेते थे
वह ज्वार बन कर कभी-कभी
गरज तो जाता था
पर अगले ही क्षण
उसे भाटा बनकर माफी मांगनी पड़ती थी
समुद्र जितना बड़ा था
उतना ही ज्यादा उस पर बंदिशें थीं
नदियां तो घूम-फिर कर हल्की हो लेती थीं
एक ही जगह पड़े-पड़े
समुद्र के तो घुटने भी दर्द करने लगे