सड़क बुहारती हुई औरत / हेमन्त प्रसाद दीक्षित

सड़क बुहारती हुई औरत
जानती है कहा-कहाँ हैं गड्ढे
कहाँ-कहाँ पड़ा है कीचड़
कहाँ-कहाँ छितरे हैं सड़े पत्ते
कहाँ-कहाँ बहाया गया है कुन्ती-पुत्र
कहाँ-कहाँ है फिसलन
कहाँ-कहाँ बिखरे हैं निरोध
और कहाँ-कहाँ थूक गया है सनातन धर्म

सड़क बुहारती हुई औरत
कई हज़ार साल गन्दगी के ख़िलाफ़ / छेड़ती है आन्दोलन
और सुस्ताने के लिए बैठकर / जलाती है बीड़ी
रामचरण शास्त्री सोचते हैं
कि उसकी सुलगी हुई बीड़ी की चिंगारी से
भस्म न हो जाएँ कहीं उनकी पोथियाँ

पृथ्वी के समूचे बर्तन को / झाड़-पोंछकर
अच्छी तरह चमकाती है
सड़क बुहारती हुई औरत
और रामचरण शास्त्री को चिन्ता है
अपनी दीमक-खाई पोथियों की।

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