बुझते हुए चराग़ फ़रोजाँ करेंगे हम / ‘वासिफ़’ देहलवी

बुझते हुए चराग़ फ़रोजाँ करेंगे हम
तुम आओगे तो जश्न-ए-चराग़ाँ करेंगे हम

बाक़ी है ख़ाक-ए-कू-ए-मोहब्बत की तिश्नगी
अपने लहू को और भी अर्ज़ां करेंगे हम

बे-चारगी के हो गए ये चारागर शिकार
अब ख़ुद ही अपने दर्द का दरमाँ करेंगे हम

जोश-ए-जुनूँ से जामा-ए-हस्ती है तार-तार
क्यूँकर एलाज-ए-तंगी-ए-दामाँ करेंगे हम

ऐ चारा-साज़ दिल की लगी का है क्या इलाज
कहने से तेरे सैर-ए-गुलिस्ताँ करेंगे हम

क्या ग़म जो हसरतों के दिए बुझ गए तमाम
दाग़ों से आज घर में चराग़ाँ करेंगे हम

‘वासिफ़’ का इंतिज़ार है थम जाओ दोस्तो
दम-भर में तै हुदूद-ए-बयाबाँ करेंगे हम