प्रार्थना / उत्पल बैनर्जी

हे ईश्वर!
हम शुद्ध मन और पवित्र आत्मा से प्रार्थना करते हैं
तू हमें हुनर दे कि हम
अपने प्रभुओं को प्रसन्न रख सकें
और हमें उनकी करुणा का प्रसाद मिलता रहे,

भीतर-बाहर हम जाने कितने ही शत्रुओं से घिरे हुए हैं
प्रभु के विरोध में बोलने वाले नीचों से
हमारे वैभव की रक्षा कर,
हमें धन और इन्हें पेट की आग दे

ज़मीन की सतह से बहुत-बहुत नीचे
पाताल में धकेल दे इन्हें,
कमज़ोर कर दे इनकी नज़रें
छीन ले इनके सपने और विचार

हमारे प्रभु हम को दीर्घायु कर
दीर्घायु कर उनकी व्यवस्था,
हम तेरी स्तुति करते हैं
तू हमें समुद्रों के उस पार ले चल
भोग के साम्राज्य में
हम भी चख सकें निषिद्ध फलों के स्वाद।

हे ईश्वर!
हम तेरी पूजा करते हैं
तू हमारे भरे-पूरे संसार को सुरक्षा दे
हमारे कोमल मन को
भूखे-नंगों की काली परछाइयों से दूर रख,
दूर रख हमारी कला-वीथिकाओं को
हाहाकार और सिसकियों से
आम आदमी के पसीने की बदबू से दूर रख
संगीत सभाओं को।

हम तुझे अर्ध्य चढ़ाते हैं
तू हमें कवि बना दे,
इन्द्रप्रस्थ का स्वप्न देखते हैं हम
तू हमें चक्रव्यूह भेदने के गुर समझा,
तू अमीर को और अमीर
ग़रीब को और ग़रीब बना
दलित को बना और भी ज़्यादा दलित

तू हमें कुबेर के ऐश्वर्य से सम्पन्न कर
हम तेरी पूजा करते हैं…

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