पानी-2 / श्रीप्रकाश मिश्र

पानी का गीत मैंने सुना था
जब वह धीरे-धीरे बह रहा था
कड़ी ज़मीन पर
अपनी ही तरंगों से टकराकर
गा रहा था

उसी गीत को मैंने सुना था
जब वह पर्वतमाथ से कूदकर
घाटी में भर रहा था
एक सहास उठ रही थी
सन्नाटे को मार रही थी
हो सकता है
किसी को उससे डर लगे
मुझे तो एक उपस्थिति का संज्ञान दे रही थी

उसी गीत को मैंने तब भी सुना था
जब उसकी मसृणता
साठ खम्भे वाले पुल की कठोरता से टकरा रही थी
न तो उसे छेद पा रही थी
न उसे तोड़ पा रही थी
फिर भी अगल-बगल से बह ज़रूर जा रही थी
उसी गीत को मैंने फिर सुना
जब वह धीरे से डेल्टा को पार कर
अथाह समुद्र में गिर रहा था
बिना अपना अस्तित्व खोए
हज़ार मील तक
नदी की तरह
संयुक्त पानी में भी
भीतर-भीतर बह रहा था

पानी की यह जिजीविषा कितनी कमनीय थी!

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