नाव चली / हरिकृष्णदास गुप्त ‘हरि’

आओ नाव तिराएँ
दीदी से बनवाएँ,
जल टब में भर लाएँ
आओ नाव बनाएँ!
छप-छप, छप-छप करती
डगमग-डगमग डोले
नाव चली, नाव चली,
उछल-उछल हम बोले!

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