धुँआ (1) / हरबिन्दर सिंह गिल

ये कैसे बादल हैं
जो बिन मौसम के हैं,
ये आसमान में नहीं रहते
रहते हैं, गली कूचों में ।

इन बादलों से
सूरज की रोशनी कम नहीं होती
न रोकते हैं, चाँदनी चांद की ।

क्योंकि, ये गरजते नहीं हैं
गिराते हैं आग
इन्सान के दिलों पर ।

क्योंकि, ये पानी नहीं बरसाते
बरसाते हैं
खून मनुष्यों का, पानी की तरह ।

क्योंकि, ये बादल
किन्हीं हवाओं से नही बने
बने हैं, नफरत की आँधी से ।

क्योंकि, ये बादल
किसी चक्रवात से नही बने
बने हैं, ग्लानि के ज्वार-भाटो से ।

क्योंकि, ये बादल
किन्हीं फसलों के लिए नही बने
न बने हैं, पेड़-पौधों के लिए
न बने हैं, पशु-पक्षियों के लिए ।

ये तो बने हैं, सिर्फ एक निम्न ध्येय के लिए
कैसे छिना जाए
अन्न का निवाला, बच्चों के मुख से ।

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