दासता / संजय कुंदन

दासता के पक्ष में दलीलें बढ़ती जा रही थीं
अब ज़ोर इस बात पर था कि
इसे समझदारी, बुद्धिमानी या व्यावहारिकता कहा जाए
जैसे कोई नौजवान अपने नियन्ता के प्रलाप पर
अभिभूत होकर ताली बजाता था
तो कहा जाता था
लड़का समझदार है

कुछ लोग जब यह लिख कर दे देते थे कि
वे वेतन के लिए काम नहीं करते
तो उनके इस लिखित झूठ पर कहा जाता था
कि उन्होंने व्यावहारिक कदम उठाया

अब शपथपूर्वक घोषणा की जा रही थी
कि हमने अपनी मर्जी से दासता स्वीकार की है
और यह जो हमारा नियंता है
उसके पास हमीं गए थे कहने कि
हमें मंजूर है दासता
हम खुशी-खुशी दास बनना चाहेंगे
ऐसा लिखवा लेने के बाद
नियंता निश्चिंत हो जाता था और भार मुक्त।

अब बेहतर दास बनने की होड़ लगी थी
एक बार दास बन जाने के बाद भी
कुछ लोग अपने मन के पन्नों पर
कई करार करते रहते थे
जैसे एक बांसुरी वादक तय करता था कि
वह अपने पचास वर्षों के लिए
अपनी बांसुरी किसी तहखाने में छुपा देगा
कई कवि अपनी कविताएं स्थगित कर देते थे

ये लोग समझ नहीं पाते थे कि
आखिर दासता से लड़ाई का इतिहास
क्यों ढोया जा रहा है
और शहीदों की मूर्तियां देख कर
उन्हें हैरत होती थी कि
कोई इतनी सी बात पर जान कैसे दे सकता है !

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