तर्ज़ जीने का सिखाती है मुझे / खलीलुर्रहमान आज़मी

तर्ज़ जीने का सिखाती है मुझे
तश्नगी ज़हर पिलाती है मुझे

रात भर रहती है किस बात की धुन
न जगाती है न सुलाती है मुझे

रूठता हूँ जो कभी दुनिया से
ज़िन्दगी आके मनाती है मुझे

आईना देखूँ तो क्यूँकर देखूँ
याद इक शख़्स की आती है मुझे

बंद करता हूँ जो आँखें क्या क्या
रोशनी सी नज़र आती है मुझे

कोई मिल जाये तो रास्ता कट जाये
अपनी परचाई डराती है मुझे

अब तो ये भूल गया किस की तलब
देस परदेस फिराती है मुझे

कैसे हो ख़त्म कहानी ग़म की
अब तो कुछ नींद सी आती है मुझे

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