ख़ुद हिजाबों सा ख़ुद जमाल सा था / ‘अदा’ ज़ाफ़री

ख़ुद हिजाबों सा ख़ुद जमाल सा था
दिल का आलम भी बे-मिसाल सा था

अक्स मेरा भी आइनों में नहीं
वो भी कैफ़ियत-ए-ख़याल सा था

दश्त में सामने था ख़ेमा-ए-गुल
दूरियों में अजब कमाल सा था

बे-सबब तो नहीं था आँखों में
एक मौसम के ला-ज़वाल सा था

ख़ौफ़ अँधेरों का डर उजालों से
सानेहा था तो हस्ब-ए-हाल सा था

क्या क़यामत है हुज्ला-ए-जाँ में
उस के होते हुए मलाल सा था

जिस की जानिब ‘अदा’ नज़र न उठी
हाल उस का भी मेरे हाल सा था

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