क्या हुए आशिक़ उस शकर-लब के / ‘ऐश’ देलहवी

क्या हुए आशिक़ उस शकर-लब के
ताने सहने पड़े हमें सब के

भूलना मत बुतों की यारी पर
हैं ये बद-केश अपने मतलब के

क़ैस ओ फ़रहाद चल बसे अफ़सोस
थे वो कम-बख़्त अपने मशरब के

शैख़ियाँ शैख़ जी की देंगे दिखा
मिल गए वो अगर कहीं अब के

याद रखना कभी न बचिएगा
मिल गए आप वक़्त गर शब के

उस में ख़ुश होवें आप या ना-ख़ुश
यार तो हैं सुना उसी ढब के

यार बिन ‘ऐश’ मय-कशी तौबा
है ये अपने ख़िलाफ़ मज़हब के

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