काबे में जाँबलब थे हम दूरी-ए-बुताँ से / मीर तक़ी ‘मीर’

काबे में जाँबलब थे हम दूरी-ए-बुताँ से
आये हैं फिर के यारों अब के ख़ुदा के याँ से

जब कौंधती है बिजली तब जानिब-ए-गुलिस्ताँ
रखती है छेड़ मेरे ख़ाशाक-ए-आशियाँ से

क्या ख़ूबी उस के मूँह की ए ग़ुन्चा नक़्ल करिये
तू तो न बोल ज़ालिम बू आती है वहाँ से

ख़ामोशी में ही हम ने देखी है मसलहत अब
हर इक से हाल दिल का मुद्दत कहा ज़बाँ से

इतनी भी बद् मिज़ाजी हर लहज़ा ‘मीर’ तुम को
उलझाव है ज़मीन से, झगड़ा है आसमाँ से

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