कला-2 / भवानीप्रसाद मिश्र

कोई अलौकिक ही
कला हो किसी के पास
तो अलग बात है

नहीं तो साधारणतया
कलाकार को तो
लौकिक का ही सहारा है

लौकिक के सहारे
लोकोपयोगी रचना ही
करनी है

और ऐसा करते-करते
जितनी अलौकिकता आ जाए
उतनी अपने भीतर भरनी है

कई लोग
लोगों को किसी
खाई की तरफ़ ले जाएँ

ऐसी कुछ चीज़ें
अलौकिक कला कहकर
रचते हैं

मगर इस तरह
न लोक बचता है
न वे बचते हैं

सब कुछ विकृत
होता है
उनकी कृतियों से

ख़ुद भी मरते-मरते
भयभीत होते हैं वे
अपनी रचना की स्मृतियों से !

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