कमर बांधे हुए चलने पे यां सब यार बैठे हैं / इंशा अल्लाह खां

कमर बांधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं ।
बहोत आगे गए, बाक़ी जो हैं तैयार बैठे हैं ।।

न छेड़ ए [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”वसन्तकाल की सुगन्धित वायु”]निक़हत-ए-बाद-ए-बहारी[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] , राह लग अपनी ।
तुझे अटखेलियाँ सूझी हैं, हम बेज़ार बैठे हैं ।।

[ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”ध्यान”]तसव्वुर[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”आकाश”]अर्श[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] पर है और सर है पा-ए-साक़ी पर ।
ग़र्ज़ कुछ और धुन में इस घड़ी मय-ख़्वार बैठे हैं ।।

बसाने नक़्शपाए [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”मुसाफ़िर के चरणचिन्हों की तरह”]रहरवाँ[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”अभिलाषाओं के कूचे में”]कू-ए-तमन्ना[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip]  में ।
नहीं उठने की ताक़त, क्या करें? लाचार बैठे हैं ।।

यह अपनी चाल है[ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”निर्बलता”]उफ़तादगी[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] से इन दिनों पहरों तक ।
नज़र आया जहां पर साया-ए-दीवार बैठे हैं ।।

कहाँ [ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”संतोष”]सब्र-ओ-तहम्मुल[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] ? आह! नंगोंनाम क्या शै है ।
मियाँ! रो-पीटकर इन सबको हम यकबार बैठे हैं ।।

[ithoughts_tooltip_glossary-tooltip content=”कुलीन मनुष्यों”]नजीबों[/ithoughts_tooltip_glossary-tooltip] का अजब कुछ हाल है इस दौर में यारो ।
जहाँ पूछो यही कहते हैं, “हम बेकार बैठे हैं” ।।

भला गर्दिश फ़लक की चैन देती है किसे इंशा !
ग़़नीमत है कि हम सूरत यहाँ दो-चार बैठे हैं ।।

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