ऐ हुस्न ज़माने के तेवर भी तो समझा कर / ‘फना’ निज़ामी कानपुरी

ऐ हुस्न ज़माने के तेवर भी तो समझा कर
अब ज़ुल्म से बाज़ आ जा अब जौर से तौबा कर

टूटे हुए पैमाने बेकार सही लेकिन
मै-ख़ाने से ऐ साक़ी बाहर तो न फेंका कर

जलवा हो तो जलवा हो पर्दा हो तो पर्दा हो
तौहीन-ए-तज़ल्ली है चिलमन से न झाँका कर

अरबाब-ए-जुनूँ में हैं कुछ अहल-ए-ख़िरद शामिल
हर एक मुसाफिर से मंज़िल को न पूछा कर

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