इक बर्ग-ए-ख़ुश्क से गुल-ए-ताज़ा तक आ गए / सईद अहमद

इक बर्ग-ए-ख़ुश्क से गुल-ए-ताज़ा तक आ गए
हम शहर-ए-दिल से जिस्म के सहरा तक आ गए

उस शाम डूबने की तमन्ना नहीं रही
जिस शाम तेरे हुस्न के दरिया तक आ गए

कुछ लोग इब्तिदा-ए-रिफ़ाक़त से क़ब्ल ही
आइंदा के हर एक गुज़िश्ता तक आ गए

ये क्या कि तुम से राज़-ए-मोहब्बत नहीं छुपा
ये क्या कि तुम भी शौक़-ए-तमाशा तक आ गए

बेज़ारी-ए-कमाल से इतना हुआ कि हम
आराम से ज़वाल-ए-तमन्ना तक आ गए

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