अगर सचमुच यह औरत / अक्षय उपाध्याय

अगर सचमुच यह औरत
इस साप्ताहिक के पन्ने से बाहर निकल आए
अगर सचमुच यह औरत
गरदन पकड़ कर चिल्लाए
तो क्या मैं सच कहूँगा ?

अगर सचमुच इस औरत के
स्तन पूरे मुखपृष्ठ पर छा जाएँ और
मेरे एकान्त में गनगनाएँ
तो क्या मौं सुनूँगा ?

अकेले में, सचमुच के अकेले में
यह औरत
कैसा सुख देगी मुझे ?
बिस्तर से बाग़पत तक
इस औरत के शरीर पर रोयें की तरह खड़ा
आतंक
क्या सचमुच मेरा आतंक है ?

अगर सचमुच यह औरत
अख़बारों की इस दुनिया से बाहर निकल कर
पूछे मुझसे मेरे घर का पता
तो क्या मैं सच कहूँगा ?

आदमी की पाँत से बाहर खदेड़ी इस औरत के भीतर
किसका जानवर दिखता है ?

इस साप्ताहिक के पन्ने से बाहर निकल कर
अपने गर्भ के बारे में
राजनीति की भाषा से बाहर सवाल करे
तो क्या मैं सच कहूँगा ?

क्या सचमुच यह औरत
साप्ताहिक के पन्नों से कभी बाहर भी होगी ?

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